XI. Arbor. Τὸ δένδρον. वृक्षः [तरुः] ।


XI





Arbor.
Ē sēmine prōcrēscit planta [1]. Planta abit in fruticem [2], frutex in arborem [3]. Arbor ā rādīce [4] sustentātur. Ē rādīce surgit stirps (stemma) [5]. Stirps dīvidit sē in rāmōs [6] et frondēs [7], ex quibus folia [8] nāscuntur. Cacūmen [9] est in summō. Truncus [10] adhaeret rādīcibus. Caudex [11] est dēsectus stīpes sine rāmīs, et habet corticem [12] et medullam [13]. Vīscum [14] adnāscitur rāmīs, quī etiam gummi, rēsīnam, picem exsūdant.

Τὸ δένδρον.
Ἐκ τοῦ σπέρματος αὐξάνεται τὸ φυτόν [1]. Τὸ φυτὸν θάμνος [2] γίνεται, ὁ θάμνος δένδρον [3]. Τὸ δένδρον ὑπὸ τῆς ῥίζης [4] ἀνέχεται. Ἐκ τῆς ῥίζης στέμμα [5] ἀνίσταται. Τὸ στέμμα εἰς κλάδους [6] καὶ πέταλα [7] ἐκτείνεται, ἐξ ὧν τὰ φύλλα [8] προέρχεται. Ἐν τῷ ἀνωτάτῳ κορυφή ἐστιν. Τὸ στέλεχος [10] τῇ ῥίζῃ πρόσκειται. Ὁ κορμὸς [11] στέμμα ἀποκοφθέν ἐστιν ἄνευ τῶν κλάδων, καὶ ἔχει τὸν φλοιὸν [12] καὶ τὸν μυελόν [13]. Ὁ ἰξὸς [14] τοῖς κλάδοις προσγεννᾶται (φύεται), οἵτινες καὶ κόμμι, ῥητίνην, πίσσαν ἰδίουσιν.

वृक्षः [तरुः]
बीजात् अंकुरः [प्ररोहः] [1] उद्भिद्यते [अंकुरायते, प्ररोहति] । अंकुरः क्षुपेण [गुल्मेन] [2] परिणमति, क्षुपः वृक्षेण [तरुणा] [3] । वृक्षः मूलेन [4] स्तभ्यते । मूलात् स्तम्भः [काण्डः] [5] उद्भवति [सम्भवति] । स्तम्भः शाखारूपेण [विटपरूपरेण] [6] पल्लवरूपेण [किसलयरूपेण] [7] च भिद्यते [विस्तीर्यते] । तेभ्यः (पल्लवेभ्यः) पत्राणि [पर्णानि] [8] जायन्ते । शिखरम् [9] अग्रे अस्ति । स्कन्धः [प्रकाण्डः] [10] मूलेषु लगति । स्थाणुः [11] निःशाकः [विना शाकाः] कृत्तकाण्डः भवति तस्य च वल्कलम् [वल्कम्, त्वक्] [12] मज्ज [13] च स्तः । वन्दाकः [कामवृक्षः, वृक्षरुहा] [14] प्रजायते यासु शाखासु ताः निर्यासम्, रालम् [अरालम्, यक्षधूपम्], तिन्दुम् [तिन्दुकम्] स्वेदयन्ति [मुञ्चन्ति] अपि ।।

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