XXXVI. Caput et manūs. Ἡ κεφαλὴ καὶ αἱ χεῖρες. मस्तकम् हस्तौ च ।


XXXVI





Caput et manūs.
In capite sunt capillus [1], quī pectitur pectine [2], bīnae aurēs [3], tempora [4] et faciēs [5]. In faciē sunt frōns [6], uterque oculus [7], nāsus [8] cum duābus nāribus, ōs [9], genae (mālae) [10] et mentum [13]. Ōs mystace [11] et labiīs [12], lingua cum palātō sēpta est dentibus [16] in maxillā. Virī mentum barbā [14] tegitur. Oculus vērō, in quō albūgō et pūpilla sunt, palpēbrīs et superciliō [15] tegitur. Contracta manus pūgnus [17], aperta manus palma [18] est. In mediō vola [19] est. Manūs extrēmitās est pollex [20], cum quātuor digitīs: indice [21], mediō [22], annulārī [23] et auriculārī [24]. In quōlibet sunt trēs articulī [a, b, c] et totidem condylī [d, e, f] cum ungue [25].

Ἡ κεφαλὴ καὶ αἱ χεῖρες.
Ἐν τῇ κεφαλῇ θρίξ [1] ἐστιν, ἥτις τῷ κτενὶ [2] κτενίζεται, δύο ὦτα [3], κρόταφοι [4] καὶ τὸ πρόσωπον [5]. Ἐν προσώπῳ εἰσὶ τὸ μέτωπον [6], ἑκάτερος ὀφθαλμὸς [7], ἡ ῥὶς [8] μετὰ δυοῖν μυκτήρων, τὸ στόμα [9], αἱ παρειαὶ [10] καὶ τὸ γένειον [13]. Τὸ στόμα τῷ μύστακι [11] καὶ τοῖς χείλεσι [12], ἡ γλῶσσα μετὰ τῆς ὑπερῴης τοῖς ὀδοῦσιν [16] ἐν τῇ γένυι (τῇ σιαγώνι) περιπεφραγμένη ἐστί. Τὸ τοῦ ἀνδρὸς γένειον τῷ πώγωνι [14] καλύπτεται. Ὁ ὀφθαλμὸς δ᾽ἐν ᾧ τὸ κυκλώπιον καὶ ἡ κόρη ἐστὶ βλεφάροις καὶ ὀφρύσι [15] καλύπτεται. Ἡ χεὶρ συσταλεῖσα πυγμὴ (κόνδυλος) [17], ἑκταθεῖσα παλάμη (θέναρ) [18] ἐστίν. Ἐν τῷ μέσῳ κοῖλος (κοτύλη) [19] ἐστί. Ὁ πέρας τῆς χειρὸς ὁ ἀντίχειρ [20] ἐστὶ, μετὰ τεσσάρων δακτύλων, δεικτικοῦ [21], καταπύγωνος (μέσου) [22], παραμέσου [23] καὶ ὠτίτου (μικροῦ) [24]. Ἐν ἑκάστῳ τρεῖς εἰσι σκυταλίδες [a, b, c] καὶ τοσοῦτοι κόνδυλοι [d, e, f] μετὰ τοῦ ὄνυχος [25].

मस्तकम् हस्तौ च ।
मस्तके विद्यन्ते यः केशः [कचः, चिकुरः, कुन्तलः] [1] सः कंकतेन [प्रसाधन्या] [2] मार्ज्यते [प्रसाध्यते], द्वौ कर्णौ [श्रोत्रे । कर्णद्वयम्, श्रोत्रद्वयम्] [3], शंखौ [कुम्भौ] [4], मुखम् [वदनम्, आननम्, आस्यम्, वक्त्रम्] [5] च । मुखे विद्यन्ते ललाटम् [6], उभे नेत्रे [लोचने, नयने, चक्षू, अक्षिणी] [7], नासा [नासिका, घ्राणम्] [8] द्वाभ्याम् नासारन्ध्राभ्याम् संयुक्ता, मुख(रन्ध्र)म् [वदन(रन्ध्र)म्, आनन(रन्ध्र)म्, आस्य(रन्ध्र)म्, वक्त्र(रन्ध्र)म्] [9], कपोलौ [गण्डौ, गल्लौ] [10] चिबुकम् [13] च । मुखरन्ध्रम् श्मश्रुणा [गुल्फेन] [11] दन्तच्छदाभ्याम् [दन्तवासोभ्याम् । ओष्ठेन अधरेण च] [12], जिह्वा [रसना] तालुना [काकुदा] सहिता दन्तैः [दशनैः, रदैः] [16] आव्रियते हन्वाम् । नरस्य चिबुकम् श्मश्रुणा [कूर्चेन] [14] छाद्यते [व्रियते] । यस्मिन् तु नेत्रे शुक्लभागः [श्वेतभागः] तारका [कनीनिका] च स्तः तत् नेत्रच्छदाभ्याम् [नयनच्छदाभ्याम्] भ्रुवा [15] च छाद्यते । बद्धः हस्तः मुष्टिः [17], प्रसृतः हस्तः तलः [18] भवति । मध्ये पुटः [19] अस्ति । हस्तस्य परा काटिः [अवधिः, अन्तः] अंगुष्ठः [20] चतुर्भिः अंगुलीभिः – तर्जन्या [प्रदर्शिन्या] [21], मध्यमया [22], अनामिकया [23], कनिष्ठया [24] च – सहितः । यस्य कस्यचित् – नखसंयुक्तस्य [नखरसंयुक्तस्य[25] त्रयः संधयः [ग्रन्थयः] [a, b, c] सन्ति समानसंख्यानि च पर्वाणि [d, e, f] ।।

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